Tuesday, 17 November 2020

मेरे विचार - देश की मीडिया और सत्ता

  मेरे विचार !


देश की मीडिया और सत्ता

आज के सन्दर्भ में भारत देश के लिए यह विचार या मुद्दा सबसे गंभीर मुद्दों में से एक है । देश का मीडिया और सत्ता कि साठ - गांठ के चलते किसी भी राष्ट्र की जनता की मजबूत पक्षधर कहीं जाने वाली मीडिया भारत में प्रोपोगेंडा चलाने का काम मजबूती से कर रही है जिसका भारत की आम जनता का कोई लेना देना नहीं है ।


आज भारत के मीडिया में शिक्षा, बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था, भुखमरी, बढ़ती आबादी की मुद्दे गायब से हो गए है । इन मुद्दों पे ना तो कभी बहस होती है और ना ही किसी प्रकार की चिंता मीडिया और सत्ता में दिखाई पड़ती है । देश का मीडिया केंद्र सरकार और प्रायोजित प्रोपेगेंडा चलाने में व्यस्त है. मीडिया का सबसे बड़ा काम कोई रह गया है तो वह है विपक्ष से सवाल करना और उनको कोसना ?


आज किस प्रकार से प्रायोजित डिबेट चलाई जाती है. सत्ता पक्ष से जुड़े अधिकतर लोग और उनके समर्थकों को उस डिबेट का हिस्सा बनाया जाता है. सुविधानुसार एंकर भी पक्ष लेता फिरता है. और फिर किसी भी बेकार के मुद्दे पे बहस करवाई जाती है और बेमतलब का हो हल्ला किया जाता है ।

और कुछ ज्यादा होने पे आवाज म्यूट करने का प्रचलन भी बहुत हावी है ।


किसी भी देश का मीडिया सत्ता पक्ष से सवाल करता है और उनको आइना दिखाने का काम करता है । हमने देखा कि अमेरिका के हालिया चुनाव में मीडिया कि अहम भूमिका रही उसने भी वास्तविकता दिखाई जनता को और जनता ने गुडबाय कर दिया ट्रम का ।

परन्तु भारत का मीडिया पूरी तरह से सत्ता पक्ष के गुणगान में व्यस्त रहता है और सत्ता पक्ष की नाकामियों को भी एक कामयाबी कि तरह गुणगान करता है । भारत के दबे कुचले लोगो की आवाज तो मीडिया से गायब सी हो गई है. कोरोना जैसी महामारी में भी सत्ता पक्ष की नाकामियों को मीडिया ने एक बहुत बड़ी कामयाबी के रूप में प्रस्तुत किया ।

भारत का ना होकर मीडिया मोदी मीडिया बन गया है ।


और कुछ पत्रकार जो स्वतंत्र पत्रकारिता करते है उनके ऊपर भी दवाब बनाया जाता है सत्ता पक्ष के लोग उन चैनलों का बायकॉट कर देते है और उन चैनलों पे अपने प्रवक्ता भेजने बन्द कर देते है और इससे भी कोई उपर उठकर मोदी जी से सवाल करता है तो उनके खिलाफ राजनीतिक द्वेष भावना से कार्यवाही करवाई जाती है ।


लिखने को तो बहुत कुछ है परन्तु उम्मीद करते है कि भारत का मीडिया जल्द ही अपना कर्तव्य निर्वहन करेगा और भारत के जनमानस की आवाज उठाएगा ।


- महेन्द्र कुमार #जालोर

Thursday, 12 November 2020

अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी और रिहाई !

 मेरे विचार

अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी और रिहाई !

साल 2018 में 53 साल के इंटिनियर डिजाइनर अनव्य नाईक
और उनकी मां कुसुम नाईक ने अलीबाग के अपने घर में खुदखुशी की थी । मरने से पहले उन्होंने अपने सुसाइड नोट में अपनी मौत के लिए 3 लोगो को जिम्मेदार ठहराया था जिसमें एक नाम अर्नब गोस्वामी का भी था । आरोप यह था कि अर्नब ने अपने दफ्तर का काम करवाने के बाद उनके 83 लाख नहीं दिए थे ।

राज्य की सरकार बदलने के बाद परिवार ने न्याय की गुहार लगाई तो महाराष्ट्र सरकार के गृह मंत्री अनिल देशमुख जी ने CID जांच के आदेश दिए थे और इसी सिलसिले में अलीबाग पुलिस ने इनको गिरफ्तार किया था ।

इस मामले को लेकर पूरे देश में अलग अलग धारणाएं बनी हुई है लोगो को अर्नब के चैनल ने खुद नहीं बताया कि किस मामले में उनको गिरफ्तार किया गया है । अर्नब इस देश के विवादित पत्रकार है जो पत्रकार कम और अपनी शैली से गुंडे ज्यादा लगते है, हर किसी को ललकार देते है , सुशांत केस में भी अर्नब ने बहुत सारे मनघड़ंत आरोप महाराष्ट्र सरकार पर लगाए जो CBI जांच में झूठे पाए गए ।

अर्नब गोस्वामी जैसे लोग टीवी पे एजेंडा और प्रोपोगेंडा चलाने का काम करते है इनकी मानसिकता अत्यन्त गिरी हुई है आज देश का चोथा स्तम्भ कहा जाने वाला मीडिया भी स्वतंत्र नहीं है । अर्नब गोस्वामी हमेशा विवादों से घिरा रहता है टीवी पर आकर चीखने चिल्लाने में माहिर है । अर्नब अपने मानसिक दिवालियापन का उदाहरण कई बार प्रस्तुत कर चुका है ।

उनकी गिरफ्तारी को भाजपा ने भुनाने और राजनीति का रूप देने का कार्य किया जो कि अत्यन्त गलत है । लोग भावनाओ में बहक करके ऐसे लोगो का समर्थन कर देते है जो की अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है । खाचकर के मीडिया को की लोकतंत्र का एक अमूल्य भाग है उसमे ऐसे लोगो की जगह बिल्कुल भी नहीं है ।

खैर, सुप्रीम कोर्ट ने 50,000 मुचलके के ऊपर अंतरिम जमानत पर तीनों को छोड़ दिया है परन्तु अभी अर्नब की मुश्किल ख़तम नहीं हुई है ।

में महाराष्ट्र सरकार का धन्यवाद ज्ञापित करता हूं कि उन्होंने परिवार की भावनाओं को समझते हुए परिवार को न्याय दिलाने के लिए सीआईडी जांच करवाई तथा अर्नब जैसे आरोपियों को देश के सामने लाया । फर्जी राष्ट्रवादी अर्नब जैसे लोग नागरिकों को भ्रमित करने का काम करते हैं उनके खिलाफ कार्रवाई महाराष्ट्र सरकार ने कि बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं ।

- महेन्द्र कुमार #जालोर


Wednesday, 11 November 2020

बिहार चुनाव का राजनीतिक विश्लेषण

 बिहार चुनाव का राजनीतिक विश्लेषण :

बिहार चुनाव: NDA को पूर्ण बहुमत, आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी, अच्छी शुरुआत के बाद भी बहुमत से दूर रह गया महागठबंधन

बिहार विधानसभा (Bihar Election) की 243 सीटों पर तीन चरणों में हुए मतदान की मंगलवार देर रात को मतगणना संपन्न हुई ।

इस बार बिहार में मुकाबला काफी दिलचस्प रहा । केंद्र और राज्य की सरकारों ने अपने संपूर्ण संसाधन एवं भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व, नरेन्द्र मोदी जी, अमित शाह जी, नीतीश कुमार जी ने अपनी पूरी ताकत बिहार चुनाव पर झोंक दी थी ।

देर रात को अंतत NDA बहुमत के आंकड़े के को पार कर पाई । एनडीए को 125 तो महागठबंधन को 110 सीट पाने में कामयाबी मिली, यह चुनाव कोरोना महामारी के बीच पहला सबसे बड़ा चुनाव है ।

एनीडीए ने मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर मौजूदा सीएम नीतीश कुमार को ही पेश किया तो महागठबंधन की ओर से 31 साल के तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे ।

चुनाव आयोग के मुताबिक़ इस बार 57.05 फ़ीसदी लोगों ने मतदान किया जो कि 2015 से ज़्यादा है. पांच साल पहले 56.66 फ़ीसदी मतदान हुआ था ।

आरजेडी और कांग्रेस ने बिहार विधानसभा चुनावों की मतणना में गड़बड़ी के आरोप लगाया है और ये दोनों पार्टियां इसे लेकर चुनाव आयोग के पास भी गईं. हालांकि बाद में चुनाव आयोग के सेक्रेटरी जनरल उमेश सिन्हा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि चूनाव आयोग किसी भी तरह के दवाब में आकर काम नहीं करता है ।

इस चुनाव में बीजेपी के सामने गठबंधन को संभालने के अलावा दूसरी चुनौती विपक्ष था जिसमें नई जान फूंकी आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने. उन्होंने धर्म और जाति की जगह लोगों के मुद्दों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य को अपने प्रचार का आधार बनाया । तेजस्वी यादव के 10 लाख नौकरियां देने का वायदा इतना लोकप्रिय हुआ कि बीजेपी को भी इस मुद्दे को अपना एजेंडा बनाना पड़ा ।

 बिहार के नतीजे साफ बताते हैं कि जातीय सघनता वाले इलाकों में वोटरों ने अपनी ही जाति का समर्थन किया है। अति पिछड़ों और अल्पसंख्यकों ने सीमांचल में नीतीश कुमार का साथ दिया तो उच्च जातियों ने बीजेपी का। इसके अलावा बिहार एम-वाई समीकरण यानी मुस्लिम-यादव वोटर अभी भी आरजेडी के साथ ही जुड़ा हुआ है।

कांग्रेस ने इस चुनाव में 70 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, और उसके हिस्से में 19 सीटों पर जीत आई और उसने 9.75 फीसदी वोट हासिल किए। यह औसत आरजेडी, बीजेपी और जेडीयू से कम है। इन तीनों दलों ने कांग्रेस के मुकाबले कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा और उनका जीत का औसत काफी अच्छा रहा. कांग्रेस पार्टी को अपने परिणामों पर समीक्षा की सख्त जरूरत है ।

31 साल के युवा तेजस्वी यादव का मुकाबला उनकी उम्र से अधिक राजनीतिक अनुभव वाले दिग्गज नेता नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से था। तेजस्वी इनसे आगे तो नहीं निकल पाए, लेकिन पीछे भी नहीं रहे। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के बेटे तेजस्वी ने अपने नेतृत्व में लड़े गए पहले ही चुनाव में जिस तरह का प्रदर्शन किया है उससे उन्होंने यह साबित कर दिया है कि पिता की विरासत से मिली राजनीतिक विरासत को वह आगे ले जाने में सक्षम हैं। तेजस्वी यादव एक अच्छे नेता बनकर उभरे है. तेजस्वी ने जनता से जुड़े मुद्दों को इस चुनाव में प्रखरता से रखा जिसकी पूरे देश में सराहना कि गई ।

- महेन्द्र कुमार
  #जालोर